अर्थव्यवस्था में नरमी को लेकर परेशान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज स्थिति का जायजा लेने और आर्थिक वृद्धि को गति देने के उपायों पर चर्चा के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली और कई आला अधिकारियों के साथ बैठक करेंगे. बताया जा रहा है कि मोदी आर्थिक स्थिति से संबंध विभिन्न पहलुओं के बारे में जेटली और वित्त मंत्रालय के सचिवों के साथ चर्चा करेंगे और साथ ही अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए उपाय तलाशेंगे. बैठक में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने के साथ हो रही कठिनाइयों, नोटबंदी के बाद के प्रभाव और राजकोषीय गुंजाइश जैसे मुद्दों पर चर्चा होने

दिल्ली अर्थव्यवस्था की स्थिति पर ताजा आंकड़ें चिंता का विषय है. वहीं इन आंकडों को लेकर नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने सकारात्मक बात कही है. समाचार एजंसी एएनआई के मुताबिक, उन्होंने दावा किया है कि इस वित्त वर्ष विकास दर 7.5 फीसद तक रहेगी. वहीं उन्होंने यह भी कहा है कि अगले दो सालों में ग्रोथ रेट 8 फीसद पर पहुंचेगा. इसके अलावा पनगढ़िया ने आर्थिक विकास से जुड़े और भी कई पहलुओं पर बात की है. पलायन की स्थिति को लेकर उन्होंने कहा- “पलायन विकास का एक अहम हिस्सा है. पलायन को हमें नकारात्मकता के साथ नहीं देखना चाहिए.

दिल्ली वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि देश की जीडीपी ग्रोथ पर वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का असर पड़ा है. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोदी सरकार के तीन साल के काम-काज का लेखा-जोखा पेश करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ देशों में संरक्षणवाद की प्रवृत्ति और वैश्विक व्यापार में कमी साफ-साफ देखी जा रही है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है. जेटली ने यूपीए सरकार में देश की आर्थिक हालात का जिक्र करते हुए कहा कि तीन साल पहले तक देश की अर्थव्यवस्था पर निवेशकों को भरोसा नहीं था, लेकिन एनडीए सरकार ने तीन सालों में अर्थव्यवस्था की विश्वसनीयता

दिल्ली देश की आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े आ गए हैं. वित्त वर्ष 2016-2017 में देश की आर्थिक विकास दर 7.1 फीसदी रही है, जबकि 2015-16 में विकास दर 8 फीसदी थी. वहीं, जनवरी-मार्च 2017 के दौरान विकास दर गिरकर 5.6 फीसदी हो गई, जबकि जनवरी-मार्च 2016 में विकास दर 8.7 फीसदी थी. 2016-17 में विकास दर के आंकड़ों से साफ है कि देश की आर्थिक विकास दर पर नोटबंदी का असर हुआ है. इसके अलावा, वित्त वर्ष 2017 की चौथी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 6.1 फीसदी रही है. विश्लेषकों का मानना है कि पिछले साल हुई नोटबंदी के चलते