केंद्रीय विश्यविद्यालय में “शिक्षा का भारतीय स्वरूप“ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन

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राज्यपाल श्री विश्वनाथ आर्लेकर ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एन.ई.पी.) भारतीय सोच, संस्कृति, इतिहास और मूल्य को आगे बढ़ाने वाली है, जिसमें हम सब को योगदान देना है ताकि यह राष्ट्र पुनः विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठापित हो सके।
राज्यपाल आज केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संगोष्ठी- “शिक्षा का भारतीय स्वरूप“ विषय पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में हमें मूल रूप से किस दिशा में आगे बढ़ना है, इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय सोच हमें दुनिया में अलग पहचान देती है। ’कन्या पूजन’ तथा ’अंतरराष्ट्रीय कन्या शिशु दिवस’ का उदाहरण देते हुए कहा कि यही सोच औपचारिकता से ज्यादा हमें वास्तविकता की ओर ले जाती है।
आर्लेकर ने कहा कि आज की शिक्षा हमें हमारी संस्कृति, परम्परा और जमीन से नहीं जोड़ पाई है। हमारी सोच पढ़-लिख का हमें भारत की मिट्टी में काम करने के लिये आगे नहीं लाती है बल्कि सिर्फ नौकरी मांगने के लिए प्रेरित करती है। इसलिये, आज यह तय करने की आवश्यकता है कि हमें नौकरी देने वाला बनना है या नौकरी मांगने वाला। मैकाले की गुलाम बनाने की शिक्षा नीति से क्या हम बाहर निकल पाएंगे। केवल, नई शिक्षा नीति हमें इसमें मदद कर सकती है। इस नीति में शिक्षण संस्थानों के विकास, हमारी संस्कृति के विचारों का प्रावधान और हमारी संस्कृति, भाषा का ध्यान रखा गया है।
राज्यपाल ने कहा कि 1947 में हमें राजनीतिक आज़ादी मिली लेकिन अंग्रेजों की दी हुई सोच से आज़ाद नहीं हो पाए। उन्होंने केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति को आगे बढ़ने में किये गए प्रयासों की सराहना की तथा कहा कि देश के अन्य विश्वविद्यालय इसका अनुसरण करेंगे।
भारत तिब्बत सहयोग मंच के राष्ट्रीय संयोजक एवम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री इंद्रेश कुमार ने कहा कि दुनिया ने मॉडल ऑफ कलेक्टिविटी दी जबकि हमारी संस्कृति ने इंटेग्रिटी का मॉडल दिया। उन्होंने कहा कि हमारी सोच में देश प्रेम प्रथम होना चाहिये। उन्होंने कहा कि देश की आजादी के लिये जितने भी संघर्ष हुए वह एक ही नारे पर लड़े गए कि “अंग्रेजों भारत छोड़ो“, वह रोटी, कपड़ा, मकान के नारों पर केंद्रित नहीं था। हमारे लिये ’ विश्व गुरु’ भगवान राम का सम्बोधन है, जबकि महाशक्ति रावण का उदबोधन। उन्होंने कहा कि जीवनमूल्य का पूजन होता है, उसे ही सलाम किया जाता है। उन्होंने कहा कि दुनिया में संस्कृति, सभ्यता और मूल्य के लिये एक राष्ट्र को चिन्हित करने की बात हो तो हमेशा “भारत, भारतीय, भारतीयता“ ही लिखा जाएगा। यह शब्द ही बहु-परम्परा, बहु-संस्कृति, बहुभाषी है।
उन्होंने कहा कि ज्ञान और विज्ञान को हमने चरित्र से लिया है। भारत सर्व समावेशी देश है। इसलिये, मज़हबी संघर्ष को हमारी संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान ही दूर कर सकता है। उन्होंने कहा कि विकास को हम ’जी डी पी’ से नहीं बल्कि “ गॉस हैप्पीनेस“ से मापते थे और हमारे लिये विकास का मॉडल भवन निर्माण नहीं बल्कि हैप्पीनेस था। हमने लघु व कुटीर उद्योग को आथर््िाक प्रगति का आधार बनाया। हमने हमेशा विश्व की चिंता की , यही नई शिक्षा नीति की परिभाषा है। उन्होंने कहा कि “ भारत की बनाएंगे, विश्व को जगायेंगे“ यही शिक्षा नीति का आधार है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो नागेश ठाकुर ने कहा कि हर राष्ट्र की अपनी संस्कृति, परम्पराएं व आत्मा होती है उसी प्रकार हर राष्ट्र की अपनी शिक्षा नीति भी होती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति पूरे राष्ट्र की शिक्षा नीति है। यह एक क्रांतिकारी कदम है जब 185 वर्षों के बाद भारत में भारतीय परंपरा, संस्कृति पर आधारित शिक्षा नीति बानी है। उन्होंने इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।
हिमालयन वेलफेयर फाउंडेशन के फाउंडर डायरेक्टर श्री नवनीत गुलेरिया तथा हिमालय परिवार के महासचिव श्री ऋषि वालिया ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इससे पूर्व, केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो एस. पी.बंसल ने राज्यपाल को सम्मानित किया तथा स्वागत किया। राज्यपाल ने इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के संशोधित लोगो और जैविक विज्ञान संकाय की शोध पत्रिका का विमोचन भी किया। इससे पूर्व, आज प्रातः राज्यपाल ने माता चामुंडा मंदिर जाकर पूजा-अर्चना की। भारत तिब्बत सहयोग मंच के राष्ट्रीय संयोजक श्री इंद्रेश कुमार, उपायुक्त श्री निपुण जिंदल, पुलिस अधीक्षक खुशहाल शर्मा, तथा अन्य अधिकारी भी इस अवसर पर उपस्थित थे।